गजल...!
कभी ह॑से कभी मुस्करा हम दिये !
यू॑ ही खता उनकी, भुला हम दिये !!
अपने पैरो पर भरोसा है बहुत !
इसलिये हर कन्धा, ठुकरा हम दिये !!
सच, दोस्तो का मोहताज नही है !
यही सोच, कदम, बढा हम दिये !!
सोच-सोच कर अब आ रही है ह॑सी !
क्यो अन्धो को आइना, दिखा हम दिये !!
दर्द ही मिला था विरासत मे दोस्तो !
कुछ उभर आये, कुछ दबा हम दिये !!
’सूत्र ’ ने दी थी आग, हवन की खातिर !
जलने लगे जब घर, तो बुझा हम दिये !!
’ सूत्रधार ’

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